पत्थलगांव ✍️जितेन्द्र गुप्ता
पौष पूर्णिमा पर विशेष ऐतिहासिक ग्राम तमता
जिला जशपुर नगर विकासखंड पत्थलगांव से 20 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम तमता स्थित है यहां आने के लिए पत्थलगांव से अंबिकापुर जाने वाली मुख्य मार्ग के दसवे किलोमीटर से उत्तर पूर्व की ओर एक सड़क है जो ग्राम को मुख्य मार्ग से जोड़ती है।
गांव के बुजुर्गों के मातानुसार यह गांव ऐतिहासिक गांव है, यहां पर राजा जमीदारों के जमाने में कोतवाली एवं उनके सैनिक टुकड़ियों रहा करती थी गांव के उत्तर पूर्व में काला विशाल पर्वत स्थित है जो हाथी के समान दिखाई देता है इसके पत्थर अभ्रक मिश्रित है जो सूर्य के प्रकाश से चमकता है ऐसा लगता है कि प्राचीन समय में ज्वालामुखी के फूटने से यह निर्मित हुआ है वर्षा ऋतु में झर झर झरते झरने दर्शनीय होते हैं इस पर्वत के ऊपर ग्राम देवता की मूर्ति है जिसके दर्शन से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ऐसा गांव के लोग एवं आसपास के लोगों को विश्वास और श्रद्धा भक्ति है ।यहां के मूल निवासियों का मत है कि पर्वत में बकासुर नाम का एक राक्षस निवास करता था उसके रहने का स्थान गुफा पर्वत में स्थित है उसे आज भी देखा जा सकता है पर्वत में उसका विशाल तलवार है जिसका दर्शन भाग्यशाली लोग कर पाते हैं।
ग्राम देवता एवं पर्वत देवता की स्थापना के लिए एक बार ग्राम के गणमान्य नागरिकों ने विचार किया कि पर्वत के ऊपर मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा किया जाए ,कार्य आरंभ किया गया मंदिर निर्माण में जो ईट पत्थर जोड़े जाते वह सुबह में नीचे गिरा हुआ मिलता था पूरी दीवाल टूटी फूटी मिला करती थी कहते हैं गांव के मुखिया को सपना के माध्यम से ग्राम देवता ने सचेत किया कि कोई भी आदमी पर्वत के ऊपर मंदिर बनवाने की कोशिश करेंगे उनकी जनधन की हानि होगी एवं गांव में अनहोनी घटनाएं घट सकती हैं तब से अब तक मंदिर निर्माण का कार्य अधूरा पड़ा हुआ है पर्वत के ऊपर नंगे पांव चढ़ने का प्रचलन है पूछने से संतोषप्रद उत्तर नहीं मिलता है। पर्वत देवता के मूर्ति के पास एक छोटा सा कुंड है जिसमें हमेशा पानी भरा होता है यह शोध का विषय हो सकता है।
ग्राम तमता में ग्रामीण स्तर की समस्त योजनाएं संचालित हो रही है, बच्चों की बालवाड़ी प्राथमिक शाला मा•शा० एवं हायर सेकेंडरी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सेवा सस्कारी समिति,आदि संस्थाएं सेवा प्रदान कर रही है,। यह गांव व आपपास के गांव आदिवासी बाहुल्य ग्राम है गांव में विभिन्न जाति के लोगों में गोड़ कवर लोहार बिंझवार कोल, धनुहार कोलता महकुल, पटवा, ब्राम्हण बनिया, आदि निवास करते है। इन लोगो का मुख्य बोली छत्तीसगढ़ी है पर उरांव लोग कुडूख, उड़िया, लरिया, सादरी भी बोलते है।
पोस्ट पूर्णिमा में छत्तीसगढ़ का महान पर छेरछेरा का त्यौहार को हर्षोल्लाह के साथ मानते हैं घर-घर में मेहमानों के आगमन से सभी एक दूसरे से अपना प्रेम प्रकट करते हैं और त्यौहार की खुशियां बताते हैं इस दिन पर्वत की तराई में दो दिवसीय मेला लगता है सुबह से दोपहर तक लोग नारियल फूल पान लेकर पर्वत देवता का दर्शन लाभ लेते हैं और पर्वत के ऊपर से प्रकृति द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेते हैं मेलों में अनेकों प्रकार की दुकान सजी होती है मिठाई की दुकान मनिहारियों की दुकान खेल खिलौने से भर कतारबद्ध दुकान अपनी और सहज ही लोगों को आकर्षित करते हैं इनके अतिरिक्त हवाई झूला कठपुतली नाच यह मेला के दर्शन आरती लोग अपना मनोरंजन करते हैं मेला को आकर्षक व मनोरंजन स्वरूप देने के लिए स्थानीय लोगों द्वारा करमा नित्य का आयोजन किया जाता है जिसमें ग्रामीण नवयुवक नवयुतियां अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित मदार के तरफ से ताल मिलाते हुए थिरकती हैं तो उनकी भाव-भाव देखते ही बनता है यह स्थल लोगों को अपनी ओर बरबस ही खींच लेता है या खींचे चले आते हैं ग्रामीण वाला है हवाई झूला बहुत पसंद करती हैं झूमकर अपार आनंद का अनुभव करती हैं प्रकृति ने ग्राम तमता को प्रकृति ने सुंदरता का उपहार दिया है। शरद ऋतु में सरसों की पीले पीले फूल की सुगंध मन को प्रफुल्लित कर देता है यहां के गली सड़क घर मकान की साफ सफाई देखकर लगता है कि यहां के लोग स्वच्छता पसंद करते हैं ग्राम विकास के लिए ग्राम सरपंच उप सरपंच नवयुवक मंडल के अलावा अन्य लोग भी अपना योगदान देते हैं जिसमें गुलाब सिदार राम रतन अग्रवाल राजेंद्र पटवा गोविंद अग्रवाल यदुनाथ सिदार योगेंद्र प्रसाद होता विजय शर्मा अजय सिंह ठाकुर झटकेश्वर प्रसाद वैष्णव हेमंत वैष्णव कैलाश शर्मा मनमोहन प्रसाद होता जी फकीर नंदे में आदि समस्त ग्रामवासी निरंतर प्रयास करते रहते हैं
रामेश्वर शांडिल्य
खूंटाघाट जिन्होंने आज से 40 वर्ष पूर्व ज्यादातर बातों को लिखा है।
























